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हलाला की आड़ में नाबालिग से गैंगरेप गंभीर अपराध, इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अमरोहा के चर्चित हलाला मामले में दर्ज FIR रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग से हलाला की आड़ में दुष्कर्म और सामूहिक बलात्कार गंभीर अपराध हैं और पर्सनल लॉ की आड़ में अपराध को छिपाया नहीं जा सकता।

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अमरोहा जिले के चर्चित हलाला प्रकरण में दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि किसी नाबालिग के साथ हलाला या किसी अन्य परंपरा की आड़ में यौन संबंध बनाए जाते हैं, तो वह गंभीर आपराधिक अपराध की श्रेणी में आता है और कानून के तहत उसकी जांच और सुनवाई आवश्यक है।

न्यायमूर्ति जे जे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने आरोपित तैयब समेत पांच आरोपियों की चार अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए सभी को खारिज कर दिया।

क्या है पूरा मामला?

एफआईआर के अनुसार पीड़िता का निकाह वर्ष 2015 में हुआ था। आरोप है कि बाद में उसे तीन तलाक दिया गया और पुनर्विवाह के लिए हलाला की प्रक्रिया से गुजरने को मजबूर किया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि उस समय पीड़िता नाबालिग थी और उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए।

मामले में आगे आरोप लगाया गया कि वर्ष 2025 में दोबारा हलाला के नाम पर पीड़िता के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। इसके बाद पुलिस ने मामले में कई अन्य आरोपियों को शामिल करते हुए भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो अधिनियम के तहत धाराएं बढ़ाईं।

अदालत ने क्या कहा?

खंडपीठ ने कहा कि पर्सनल लॉ या धार्मिक परंपराओं का हवाला देकर किसी भी व्यक्ति को आपराधिक कानून से छूट नहीं मिल सकती। यदि पीड़िता घटना के समय नाबालिग थी, तो मामला प्रथम दृष्टया पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध बनता है।

अदालत ने यह भी कहा कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और इस स्तर पर मामले की विस्तृत जांच आवश्यक है। इसलिए एफआईआर को निरस्त नहीं किया जा सकता।

संवैधानिक मूल्यों का भी उल्लेख

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह हलाला प्रथा की संवैधानिक वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है, लेकिन एफआईआर में वर्णित परिस्थितियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होती हैं।

याचिकाएं खारिज, जांच जारी रहेगी

पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं पहले ही खारिज की जा चुकी हैं। साथ ही पीड़िता द्वारा कथित दबाव और धमकी को लेकर एक अन्य प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई है।

अदालत ने कहा कि मामले के तथ्यों और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए विस्तृत जांच आवश्यक है और इस स्तर पर हस्तक्षेप उचित नहीं होगा। इसके साथ ही सभी चार याचिकाएं खारिज करते हुए अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिए गए।

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