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भारत का अपना GPS होगा और ताकतवर, इसरो ने लॉन्च किया स्वदेशी सैटेलाइट; अब स्मार्टफोन में भी दिखेगा NavIC का दम

ISRO NVS-03 Launch: इसरो ने 2232 किलोग्राम वजनी NVS-03 नेविगेशन सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित किया। L1, L5 और S बैंड से मजबूत होगा भारत का NavIC सिस्टम। जानिए स्मार्टफोन और आम लोगों को क्या होगा फायदा।

श्रीहरिकोटा। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने देश की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NavIC को मजबूत बनाने के लिए अगली पीढ़ी के नेविगेशन उपग्रह NVS-03 को सफलतापूर्वक जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित कर दिया है। इस मिशन के साथ भारत की अपनी सैटेलाइट नेविगेशन तकनीक को नई क्षमता मिली है। इसका फायदा आने वाले समय में स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं से लेकर सड़क परिवहन, विमानन, समुद्री नौवहन और रक्षा क्षेत्र तक को मिल सकता है।

इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि NVS-03 में L1, L5 और S बैंड पर सिग्नल प्रसारित करने की क्षमता है। खास तौर पर L1 बैंड जुड़ने से आधुनिक स्मार्टफोन और स्मार्टवॉच जैसे उपकरणों में भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली के इस्तेमाल का रास्ता और आसान होगा। इससे विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर निर्भरता कम करने की भारत की कोशिश को मजबूती मिलेगी।

GSLV-F18 रॉकेट से हुआ NVS-03 का प्रक्षेपण

इसरो ने शुक्रवार रात 30 अक्टूबर को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से NVS-03 उपग्रह का प्रक्षेपण किया। इसके लिए 50 मीटर ऊंचे तीन चरणों वाले GSLV-F18 रॉकेट का इस्तेमाल किया गया।

रॉकेट ने रात 11 बजकर 51 मिनट पर दूसरे लॉन्च पैड से उड़ान भरी। करीब 2232 किलोग्राम वजनी उपग्रह को निर्धारित जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया।

यह मिशन भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NavIC के विस्तार और उसकी तकनीकी क्षमता बढ़ाने की दिशा में अहम कदम है। इससे देश के अपने सैटेलाइट आधारित लोकेशन नेटवर्क को और मजबूत बनाने में मदद मिलेगी।

क्या है NavIC और कैसे करता है काम?

NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। यह भारत की अपनी क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली है, जिसे इसरो ने विकसित किया है।

इसे अमेरिका के GPS की तरह लोकेशन, नेविगेशन और टाइमिंग यानी PNT सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

इसकी मदद से किसी व्यक्ति, वाहन, जहाज या अन्य उपकरण की भौगोलिक स्थिति का पता लगाया जा सकता है। इसके अलावा समय का सटीक निर्धारण भी किया जा सकता है।

NavIC की सेवाओं का दायरा भारत और उसकी सीमाओं से लगभग 1500 किलोमीटर तक फैला हुआ है। इस प्रणाली का इस्तेमाल परिवहन, समुद्री गतिविधियों, विमानन, आपदा प्रबंधन और रणनीतिक जरूरतों में किया जा सकता है।

NVS-03 में L1 बैंड जुड़ने से स्मार्टफोन यूजर्स को क्या फायदा?

NVS-03 की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी विशेषता इसकी नई सिग्नल क्षमता है। यह उपग्रह L1, L5 और S बैंड पर सिग्नल प्रसारित करेगा।

अब तक NavIC मुख्य रूप से L5 और S बैंड पर आधारित था। लेकिन NVS-03 में L1 बैंड को भी शामिल किया गया है।

L1 बैंड का इस्तेमाल दुनियाभर में कई आधुनिक नेविगेशन प्रणालियों में होता है। स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच और दूसरे वियरेबल उपकरणों में भी इस फ्रीक्वेंसी का व्यापक उपयोग किया जाता है।

इस बदलाव से NavIC को आधुनिक उपभोक्ता उपकरणों के साथ जोड़ना आसान हो सकता है। यानी भविष्य में ऐसे स्मार्टफोन और अन्य डिवाइस जो NavIC के अनुकूल होंगे, उनमें भारत की स्वदेशी नेविगेशन सेवा का लाभ मिल सकेगा।

हालांकि, इसका लाभ उठाने के लिए संबंधित स्मार्टफोन और उपकरणों में जरूरी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर सपोर्ट होना भी आवश्यक होगा।

स्वदेशी रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक से बढ़ेगी सटीकता

NVS-03 में स्वदेशी रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक लगाई गई है। इसे इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर ने विकसित किया है।

सैटेलाइट नेविगेशन में समय की सटीकता बेहद महत्वपूर्ण होती है। उपग्रह से प्राप्त सिग्नल को पृथ्वी तक पहुंचने में लगने वाले समय के आधार पर ही किसी स्थान की दूरी और स्थिति का निर्धारण किया जाता है।

ऐसे में एटॉमिक क्लॉक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह बेहद सटीक समय उपलब्ध कराने में मदद करती है।

भारत में विकसित इस तकनीक का इस्तेमाल स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली की तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

भारत की सीमाओं से 1500 किलोमीटर तक मिलेगी NavIC सेवा

भारत ने NavIC को अपनी क्षेत्रीय जरूरतों के अनुरूप विकसित किया है। इसकी सेवाएं भारत और देश की सीमाओं से करीब 1500 किलोमीटर तक के क्षेत्र में उपलब्ध कराने के लिए तैयार की गई हैं।

NVS-03 जैसे नए उपग्रह इस नेटवर्क की क्षमता और निरंतरता को मजबूत करने में मदद करेंगे।

इसका इस्तेमाल कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हो सकता है:

  • सड़क परिवहन: वाहनों की लोकेशन और नेविगेशन सेवाओं में मदद।

  • समुद्री नौवहन: जहाजों और मछुआरों को दिशा और स्थान की जानकारी।

  • विमानन: विमान संचालन और नेविगेशन संबंधी सेवाएं।

  • आपदा प्रबंधन: आपातकालीन परिस्थितियों में लोकेशन आधारित सहायता।

  • रक्षा क्षेत्र: रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी गतिविधियों में स्वदेशी नेविगेशन क्षमता।

  • सटीक समय निर्धारण: विभिन्न तकनीकी और संचार प्रणालियों को समय संबंधी सेवाएं।

इस तरह NavIC केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि देश की महत्वपूर्ण तकनीकी जरूरतों से जुड़ा नेटवर्क है।

NVS-02 मिशन की तकनीकी खामी से इसरो ने लिया सबक

NVS-03 मिशन को पिछले अनुभवों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जनवरी 2025 में NVS-02 उपग्रह के मिशन के दौरान तकनीकी समस्या सामने आई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, एक कनेक्टर में खराबी के कारण उपग्रह की प्रणोदन प्रणाली अपेक्षित तरीके से काम नहीं कर सकी थी। इसके चलते उपग्रह को निर्धारित अंतिम कक्षा तक पहुंचाने में कठिनाई आई।

इस अनुभव से सबक लेते हुए NVS-03 में इंजीनियरिंग और तकनीकी व्यवस्था में जरूरी सुधार किए गए हैं।

अंतरिक्ष मिशनों में इस तरह की तकनीकी सीख महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि उपग्रह के प्रक्षेपण के बाद उसकी कक्षा में स्थिति और संचालन संबंधी सभी प्रक्रियाएं बेहद सटीक होनी चाहिए।

‘नॉटी बॉय’ GSLV की एक और अहम उड़ान

NVS-03 का प्रक्षेपण GSLV-F18 रॉकेट के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह GSLV की 20वीं उड़ान बताई गई है।

GSLV को शुरुआती दौर में क्रायोजेनिक इंजन और तीसरे चरण की तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। इन्हीं चुनौतियों के कारण इसे अनौपचारिक रूप से ‘नॉटी बॉय’ नाम दिया गया।

हालांकि, लगातार परीक्षणों और तकनीकी सुधारों के माध्यम से इसरो ने इस प्रक्षेपण यान की क्षमता को बेहतर बनाया है।

GSLV-F18 की उड़ान से भारत की भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की क्षमता को भी मजबूती मिली है।

विदेशी GPS पर निर्भरता घटाने की दिशा में भारत का बड़ा कदम

आज दुनिया में लोकेशन और नेविगेशन सेवाओं के लिए अमेरिका के GPS सहित कई अंतरराष्ट्रीय प्रणालियों का इस्तेमाल होता है। भारत की अपनी NavIC प्रणाली विकसित करने का एक बड़ा उद्देश्य देश को स्वतंत्र और भरोसेमंद नेविगेशन क्षमता उपलब्ध कराना है।

NVS-03 के सफल प्रक्षेपण से इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।

इसका फायदा केवल आम नागरिकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवहन, संचार, आपदा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी स्वदेशी तकनीक की भूमिका बढ़ सकती है।

कुल मिलाकर NVS-03 का प्रक्षेपण भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अब चुनौती इस तकनीक को अधिक से अधिक आधुनिक उपकरणों में उपलब्ध कराने और NavIC नेटवर्क को लगातार मजबूत बनाने की होगी।

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