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लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट में बड़ा एक्शन: आरक्षी सुनील कुमार शुक्ला सेवा से बर्खास्त

लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट ने आरक्षी सुनील कुमार शुक्ला को विभागीय अनुशासनहीनता और सोशल मीडिया पर गंभीर आरोप लगाने के मामले में सेवा से बर्खास्त कर दिया। जांच में आरोप सिद्ध पाए गए।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश पुलिस कमिश्नरेट लखनऊ ने विभागीय अनुशासनहीनता और नियमों के उल्लंघन के मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए आरक्षी सुनील कुमार शुक्ला को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। यह कार्रवाई सोशल मीडिया पर पुलिस विभाग और वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाने के बाद की गई है।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, मई माह में सुनील कुमार शुक्ला ने एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया था, जिसमें उन्होंने विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और अन्य कर्मियों पर रिश्वतखोरी और शोषण जैसे गंभीर आरोप लगाए थे।

जांच के लिए गठित हुई थी समिति

मामले के सामने आने के बाद पुलिस कमिश्नरेट ने एक जांच समिति का गठन किया था। समिति ने पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच की और संबंधित पुलिसकर्मियों के बयान दर्ज किए।

जांच के दौरान आरक्षी सुनील कुमार शुक्ला को अपना पक्ष रखने और साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया गया, लेकिन वह अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके।

जांच में आरोप सिद्ध

जांच रिपोर्ट में यह पाया गया कि आरक्षी ने बिना किसी साक्ष्य के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आरोप लगाए, जिससे पुलिस विभाग की छवि को नुकसान पहुंचा।

इसके अलावा उन पर यह भी आरोप सिद्ध हुआ कि उन्होंने अधिकारियों के प्रति अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया और विभागीय अनुशासन को प्रभावित करने का प्रयास किया।

नियमों के उल्लंघन के आरोप

पुलिस प्रशासन के अनुसार, सुनील कुमार शुक्ला ने बिना अनुमति सोशल मीडिया का उपयोग कर उत्तर प्रदेश सोशल मीडिया नीति-2023, सरकारी सेवक आचरण नियमावली-1956 के विभिन्न प्रावधानों तथा वर्दी विनियम का उल्लंघन किया।

इन गंभीर अनुशासनहीनताओं के आधार पर पुलिस कमिश्नरेट ने उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का आदेश जारी किया।

बर्खास्तगी के बाद बयान

सेवा से बर्खास्त होने के बाद आरक्षी सुनील कुमार शुक्ला ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें “सच बोलने का इनाम मिला है।” उनका यह बयान सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट की इस कार्रवाई को विभागीय अनुशासन बनाए रखने की दिशा में सख्त कदम माना जा रहा है, वहीं यह मामला सोशल मीडिया के उपयोग और सरकारी सेवकों की अभिव्यक्ति की सीमाओं पर भी बहस को जन्म दे रहा है।

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