आरएसएस के 100 साल पूरे: मोहन भागवत बोले- भारत में कभी रिजीम चेंज नहीं हुआ, न होगा; समाधान के लिए हों आंदोलन
RSS शताब्दी समारोह में मोहन भागवत ने कहा कि भारत में रिजीम चेंज न कभी हुआ है, न होगा। जानिए आंदोलन, राष्ट्रनिष्ठा, एआई, ओटीटी और सामाजिक सद्भाव पर उनका पूरा संदेश।
नागपुर, महाराष्ट्र। मोहन भागवत का बयान आरएसएस के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी समारोह में चर्चा का प्रमुख विषय रहा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में दुनिया के अलग-अलग देशों में राजनीतिक अस्थिरता, भारत में लोकतांत्रिक आंदोलनों, राष्ट्रनिष्ठा, तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), ओटीटी प्लेटफॉर्म और युवाओं में नशे की समस्या जैसे मुद्दों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य समाधान खोजना होना चाहिए और किसी भी गतिविधि से समाज में द्वेष या विभाजन नहीं पैदा होना चाहिए।
आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित इस समारोह में दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस समेत कई प्रमुख हस्तियों की मौजूदगी बताई गई।
भारत में रिजीम चेंज को लेकर क्या बोले मोहन भागवत?
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दुनिया के विभिन्न देशों में हो रही राजनीतिक उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल की घटनाओं पर टिप्पणी की। उन्होंने इन घटनाओं को एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा बताया और कहा कि दुनिया भर में रिजीम चेंज के नाम पर चल रही कार्रवाइयों से प्रगतिशील देश भी प्रभावित हैं।
भागवत ने कहा कि भारत में न कभी रिजीम चेंज हुआ है और न होगा। उनका यह बयान संघ के शताब्दी समारोह में दिए गए प्रमुख संदेशों में शामिल रहा।
आंदोलन समाधान के लिए हों, समाज में विभाजन न बढ़े
मोहन भागवत ने कहा कि भारत विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन विकास की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। ऐसे में समस्याएं बनी रह सकती हैं और लोकतंत्र में उनके समाधान के लिए आंदोलन भी होते रहेंगे।
उन्होंने जोर दिया कि आंदोलनों का मकसद समाधान खोजना होना चाहिए। किसी भी आंदोलन या गतिविधि से समाज में अनबन, द्वेष अथवा विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, सामाजिक समस्याओं को दूर करने के लिए ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए जो समाधान की दिशा में आगे बढ़ें और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखें।
राष्ट्रनिष्ठा और कर्तव्यबोध को बताया सर्वोपरि
संघ प्रमुख ने राष्ट्र के प्रति निष्ठा और नागरिकों के कर्तव्यों को देश की वास्तविक ताकत बताया। उन्होंने कहा कि भाषा, जाति और पंथ के प्रति लगाव स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन राष्ट्रनिष्ठा और कर्तव्यबोध को सर्वोच्च महत्व मिलना चाहिए।
संविधान की प्रस्तावना में शामिल ‘हम भारत के लोग’ का उल्लेख करते हुए भागवत ने इसे देशवासियों के बीच भावनात्मक बंधन का प्रतीक बताया। उनके मुताबिक, भारत की विविधता के बावजूद लोगों को एक राष्ट्र के रूप में जोड़ने में यह भावना महत्वपूर्ण है।
वंदे मातरम् को स्वाभिमान के साथ गाने की अपील
मोहन भागवत ने वंदे मातरम् का उल्लेख करते हुए कहा कि बंग-भंग के दौरान विभाजनकारी प्रयासों का मुकाबला करने में इस गीत ने एकता की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् आज भी देशवासियों को एकजुट करने की क्षमता रखता है।
भागवत ने इसे स्वाभिमान के साथ और पूरे स्वर में गाने की बात कही। उन्होंने मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और भक्ति के भाव को भी अपने संबोधन में रेखांकित किया।
एआई और तकनीक के इस्तेमाल में नैतिक अनुशासन जरूरी
तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से बढ़ते प्रभाव पर संघ प्रमुख ने कहा कि तकनीक के अनेक लाभ हैं और उसकी प्रगति को रोका नहीं जा सकता। हालांकि, ज्ञान और तकनीक का वास्तविक महत्व इस बात से तय होता है कि उनका उपयोग किस दिशा में और कितने विवेक के साथ किया जाता है।
उन्होंने चेताया कि नैतिक अनुशासन के बिना एआई और तकनीक का इस्तेमाल विनाशकारी परिणाम दे सकता है। भागवत ने कहा कि भारत के विश्वगुरु बनने की आकांक्षा को पूरा करने के लिए नई पीढ़ी को जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए तैयार करना आवश्यक है।
ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अनुशासन की जरूरत
ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री के संबंध में भागवत ने कहा कि नई पीढ़ी कई माध्यमों से मिलने वाली जानकारी को उचित-अनुचित का विवेक किए बिना ग्रहण कर सकती है। उनके मुताबिक, कुछ देशों ने ऐसे माध्यमों को लेकर नियम और अनुशासन लागू किए हैं।
उन्होंने कहा कि भारत में भी विशेष रूप से ओटीटी प्लेटफॉर्म के संबंध में ऐसी जरूरत महसूस की जा रही है। भागवत ने शासन और प्रशासन से इस विषय पर विचार करने की बात कही।
युवाओं में नशे की लत को बताया गंभीर राष्ट्रीय समस्या
मोहन भागवत ने युवाओं में नशीले पदार्थों की लत पर चिंता जताते हुए इसे गंभीर राष्ट्रीय समस्या बताया। उन्होंने कहा कि इस चुनौती का सामना करने के लिए शासन, प्रशासन और समाज को मिलकर कदम उठाने होंगे।
उन्होंने अभिभावकों और समाज की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि नई पीढ़ी में सही-गलत की समझ, विवेक और नैतिक संस्कार विकसित करना जरूरी है।
भारत की सनातन परंपरा और वैश्विक चुनौतियां
भागवत ने कहा कि दुनिया विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने तथा विविधताओं के साथ सामंजस्य स्थापित करने की चुनौती का सामना कर रही है। उन्होंने भारतीय सनातन परंपरा को ऐसी दृष्टि के रूप में प्रस्तुत किया, जो विविधता के सम्मान, संयम, त्याग और समन्वय पर जोर देती है।
उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा सभी पंथों, भाषाओं और संस्कृतियों के सम्मान की बात करती है। उनके संबोधन में विश्व को परिवार मानने और संतुलित विकास की अवधारणा भी प्रमुख रही।
संघ के 100 वर्षों के कार्य और स्वदेशी पर जोर
आरएसएस के शताब्दी वर्ष का उल्लेख करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि संघ पिछले 100 वर्षों से भारत के स्वबोध को जगाने और संगठित समाज के निर्माण की दिशा में कार्य कर रहा है। उन्होंने पंच परिवर्तन का उल्लेख करते हुए स्वबोध, स्वदेशी आचरण और सांस्कृतिक अस्मिता को महत्वपूर्ण बताया।
समारोह में संघ की स्थापना, उसकी वैचारिक यात्रा और भविष्य में समाज के बीच काम जारी रखने के लक्ष्य पर भी चर्चा हुई।
संजय गुप्त ने संघ की वैचारिक भूमिका का किया उल्लेख
समारोह के मुख्य अतिथि और दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त ने संघ के योगदान पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना का उद्देश्य हिंदू समाज को एकजुट और सामर्थ्यवान बनाना तथा राष्ट्र के स्वाभिमान को मजबूत करना था।
संजय गुप्त ने जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के विकास का उल्लेख करते हुए कहा कि भाजपा के नेताओं में भारतीयता और राष्ट्रीयता के संस्कार विकसित करने में संघ की भूमिका रही है। उन्होंने पार्टी की सफलता के पीछे संघ की वैचारिक दृढ़ता और संगठनात्मक अनुशासन को महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि चुनौतियों और आरोपों के बावजूद संघ व्यक्ति निर्माण और राष्ट्रनिष्ठा के मार्ग पर आगे बढ़ता रहा है। उनके संबोधन में भारतीय संस्कृति, सामाजिक सद्भाव और देश के प्रति समर्पण पर जोर रहा।
शताब्दी समारोह में भविष्य की दिशा पर भी चर्चा
नागपुर में आयोजित आरएसएस के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी समारोह में संगठन की 100 साल की यात्रा के साथ आने वाले समय की चुनौतियों पर भी विचार रखे गए। मोहन भागवत के संबोधन में लोकतंत्र में आंदोलनों की भूमिका, राष्ट्रनिष्ठा, सामाजिक सद्भाव, तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल और युवाओं को नशे से बचाने जैसे विषय शामिल रहे।
समारोह का प्रमुख संदेश यह रहा कि समस्याओं का समाधान खोजने के लिए समाज और शासन को जिम्मेदारी के साथ प्रयास करना चाहिए तथा किसी भी गतिविधि से सामाजिक एकता को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।


