नोएडा हिंसा मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का ‘सेफ्टी वाल्व’
नोएडा हिंसा मामले में इलाहाबाद HC ने शांतिपूर्ण विरोध को लोकतंत्र का ‘सेफ्टी वाल्व’ बताया। आकृति चौधरी पर लगा NSA रद कर पांच लाख मुआवजे का आदेश दिया।
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा में मजदूरों के वेतन वृद्धि आंदोलन से जुड़े हिंसा के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र में नागरिकों का मूल अधिकार है और यह शासन के लिए ‘सेफ्टी वाल्व’ की तरह काम करता है। इसे मनमाने तरीके से दबाया नहीं जा सकता। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस साक्ष्य के किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला स्वीकार्य नहीं है और ऐसी स्थिति में अदालतें मूकदर्शक नहीं बनी रह सकतीं।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए उस पर लगाया गया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) रद कर दिया। कोर्ट ने मामले में पुलिस की कहानी में गंभीर विरोधाभास पाया और गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी द्वारा NSA लगाए जाने की कार्रवाई पर भी कड़ी टिप्पणी की।
हिंसा से दो दिन पहले ही हिरासत में थी आकृति
कोर्ट के सामने मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि आकृति चौधरी को पुलिस ने 11 अप्रैल 2026 को हिरासत में लिया था, जबकि नोएडा में हिंसा और आगजनी की घटना 13 अप्रैल 2026 को हुई थी।
पीठ ने सवाल किया कि जब संबंधित व्यक्ति हिंसा की घटना से पहले ही पुलिस हिरासत में था तो उसके खिलाफ बाद में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदारी कैसे तय की जा सकती है। कोर्ट ने पाया कि गंभीर आरोपों के समर्थन में पुलिस की ओर से पर्याप्त ठोस साक्ष्य या वीडियो पेश नहीं किया जा सका।
BNSS की धारा 130 का नोटिस भी सवालों के घेरे में
हाई कोर्ट ने मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत जारी किए गए नोटिस की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। कोर्ट के अनुसार, यह नोटिस गिरफ्तारी के बाद तैयार किया गया औपचारिक दस्तावेज प्रतीत हुआ।
पीठ ने इस पूरी कार्रवाई को गंभीरता से लेते हुए गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी द्वारा NSA लगाए जाने को अत्यंत क्रूर और गैर-जिम्मेदाराना कार्रवाई करार दिया।
‘शांतिपूर्ण विरोध को मनमाने तरीके से नहीं दबाया जा सकता’
हाई कोर्ट ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि नागरिकों को अपनी मांगों और असहमति को शांतिपूर्ण तरीके से सामने रखने का अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विरोध का अधिकार शासन के लिए एक तरह के ‘सेफ्टी वाल्व’ की भूमिका निभाता है।
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(बी) का उल्लेख करते हुए कहा कि नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा बिना हथियार शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होकर विरोध करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
निवारक कानूनों का इस्तेमाल जमानत रोकने के लिए नहीं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कड़े निवारक कानूनों का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक मामलों में जमानत के रास्ते को रोकने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि बिना पुख्ता साक्ष्य के किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित की जाती है तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करेगी।
पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि ऐसी स्वतंत्रता पर अनुचित तरीके से हमला होने की स्थिति में अदालतें चुप नहीं रह सकतीं।
पांच लाख रुपये मुआवजे का आदेश
हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया है। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि मुआवजे की राशि सरकारी खजाने से नहीं दी जाएगी।
अदालत के निर्देश के मुताबिक यह राशि मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूली जाएगी। इसमें गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी और शुरुआती रिपोर्ट तैयार करने वाले थाना प्रभारी समेत जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है।
अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी निर्देश
कोर्ट ने मामले में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का सख्त संदेश दिया है। अदालत की टिप्पणी का मूल संदेश यह है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर प्रशासन नागरिकों के मौलिक अधिकारों को मनमाने ढंग से सीमित नहीं कर सकता।
नोएडा हिंसा मामले में यह फैसला शांतिपूर्ण विरोध, निवारक कानूनों के इस्तेमाल और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।




