सुप्रीम कोर्ट ने WhatsApp को फटकारा: ‘सब्जी बेचने वाला आपकी शर्तें कैसे समझेगा?’
सुप्रीम कोर्ट की WhatsApp को फटकार: डेटा शेयरिंग और ‘टेक इट ऑर लीव इट’ प्राइवेसी पॉलिसी पर SC ने सख्त रुख अपनाया, नागरिकों की निजता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मैसेजिंग ऐप WhatsApp और उसकी पैरेंट कंपनी Meta को यूजर्स के डेटा शेयरिंग को लेकर कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने साफ कहा कि देश के नागरिकों की निजता के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
यह टिप्पणी WhatsApp की ‘टेक इट ऑर लीव इट’ प्राइवेसी पॉलिसी के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई के दौरान आई। जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि प्राइवेसी शर्तें इतनी जटिल भाषा में लिखी जाती हैं कि आम आदमी उन्हें समझ ही नहीं पाता।
“सब्जी बेचने वाला आपकी शर्तें कैसे समझेगा?”
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तीखा सवाल उठाते हुए कहा,“क्या एक सब्जी बेचने वाला या आम नागरिक आपकी शर्तों को समझ पाएगा?”
कोर्ट ने माना कि तकनीकी शब्दों से भरी प्राइवेसी पॉलिसी आम लोगों के लिए भ्रम पैदा करती है और इससे निजी जानकारी की चोरी का खतरा बढ़ता है।
“ऑप्ट-आउट का विकल्प कहां है?”
अदालत ने WhatsApp से पूछा कि यूजर्स को डेटा शेयरिंग से बाहर निकलने (Opt-Out) का विकल्प क्यों नहीं दिया गया। कोर्ट ने कहा कि जब यूजर्स के पास कोई वास्तविक विकल्प न हो—या तो पॉलिसी मानो या ऐप छोड़ो—तो ऐसे एग्रीमेंट असमान (Unequal Agreements) माने जाएंगे।
निजता का अधिकार सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि भारत में निजता का अधिकार संवैधानिक रूप से संरक्षित है। कोर्ट ने कहा कि टेक कंपनियां यूजर्स की मजबूरी और कमजोरी का फायदा नहीं उठा सकतीं।
अदालत ने WhatsApp-Meta की दलीलों पर गंभीर असहमति जताते हुए कहा कि यह तरीका “प्राइवेट डेटा चोरी का एक सभ्य रूप” प्रतीत होता है।




