Breaking NewsE-paperउत्तर प्रदेशराजनीतिराज्यसमाचार

शाहजहांपुर लाट साहब जुलूस: मस्जिदों-मजारों को तिरपाल से ढका, प्रशासन अलर्ट

“शाहजहांपुर लाट साहब जुलूस और जूतामार होली के मद्देनजर प्रशासन ने जुलूस मार्ग की 48 मस्जिदों व मजारों को तिरपाल से ढक दिया है। एसपी राजेश द्विवेदी ने बताया कि भारी पुलिस बल, PAC, RAF और NDRF की तैनाती की गई है। ” पढ़ें पूरी रिपोर्ट…

शाहजहांपुर। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में होली के अवसर पर निकलने वाले पारंपरिक ‘लाट साहब’ जुलूस को लेकर प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए हैं। ‘जूतामार होली’ की परंपरा को देखते हुए जुलूस मार्ग पर पड़ने वाली 48 मस्जिदों और मजारों को एहतियातन प्लास्टिक तिरपाल से ढक दिया गया है। अधिकारियों ने सोमवार को इसकी जानकारी दी।

डेढ़ गुना अधिक पुलिस बल तैनात

पुलिस अधीक्षक राजेश द्विवेदी के अनुसार, इस वर्ष पिछले साल की तुलना में डेढ़ गुना अधिक पुलिस बल तैनात किया जाएगा। जुलूस की सुरक्षा के लिए चार अपर पुलिस अधीक्षक, 13 क्षेत्राधिकारी, 310 दरोगा, 1200 सिपाही और 500 होमगार्ड जवान तैनात रहेंगे।

इसके अलावा प्रादेशिक आर्म्ड कांस्टेबुलरी (PAC) और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की चार-चार कंपनियां तथा राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) की टीम भी तैनात की जाएगी।

शहर में लगभग आठ किलोमीटर के दायरे में निकलने वाले बड़े और छोटे ‘लाट साहब’ जुलूस पर निगरानी के लिए 100 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। पिछले वर्ष हुए कुछ विवादों को देखते हुए इस बार एक अतिरिक्त जोन बनाया गया है। प्रशासन पिछले एक महीने से शांति समिति की बैठकों के माध्यम से विभिन्न समुदायों से संवाद कर रहा है।

200 से अधिक मजिस्ट्रेट रहेंगे तैनात

अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) रजनीश कुमार मिश्रा ने बताया कि जुलूस मार्ग से जुड़ी 148 गलियों को अवरुद्ध कर वहां अवरोधक लगाए जाएंगे, ताकि अनियंत्रित भीड़ न उमड़े। इसके अलावा होलिका दहन स्थलों पर 103 मजिस्ट्रेट तैनात रहेंगे।

क्या है ‘लाट साहब’ जुलूस की परंपरा?

स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. विकास खुराना के अनुसार, इस जुलूस की परंपरा 18वीं शताब्दी से जुड़ी है। उन्होंने बताया कि जब नवाब अब्दुल्ला खान 1728 में फर्रुखाबाद से लौटे तो उस दिन होली थी और हिंदू-मुस्लिम समुदाय ने मिलकर उनके साथ होली खेली तथा नगर भ्रमण किया। तभी से यह परंपरा शुरू हुई।

1859 में अंग्रेजों के कब्जे के बाद जिला प्रशासन इस जुलूस का आयोजन करने लगा। आजादी के बाद इसे ‘नवाब साहब का जुलूस’ कहा जाता रहा, लेकिन 1988 में तत्कालीन जिलाधिकारी कपिल देव ने इसका नाम ‘लाट साहब का जुलूस’ कर दिया।

समय के साथ जुलूस का स्वरूप बदला और ‘लाट साहब’ को जूते-चप्पलों से मारने की परंपरा जुड़ गई, जिसे ‘जूतामार होली’ कहा जाने लगा। परंपरा के अनुसार होली के दिन एक व्यक्ति को ‘लाट साहब’ बनाया जाता है, जिसे भैंसा गाड़ी पर तख्त रखकर बैठाया जाता है। जुलूस फूलमती देवी मंदिर से शुरू होकर कोतवाली पहुंचता है, जहां ‘लाट साहब’ कोतवाल से सालभर के अपराधों का हिसाब मांगते हैं। इसके बाद जुलूस शहर के विभिन्न हिस्सों में भ्रमण करता है।

1990 में इस जुलूस को रोकने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी, लेकिन अदालत ने इसे पुरानी परंपरा मानते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था।

प्रशासन का उद्देश्य

प्रशासन का कहना है कि तिरपाल लगाने का उद्देश्य किसी समुदाय की भावना आहत होने से बचाना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। त्योहार के दौरान सौहार्द और शांति कायम रहे, इसके लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

Related Articles

Back to top button