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पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट की सख्ती से बढ़ीं प्रधानों की धड़कनें

इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के सरकारी फैसले को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद पंचायत प्रतिनिधियों और प्रधानों की चिंता बढ़ गई है। अदालत ने सरकार से पंचायत चुनाव कराने की स्पष्ट समय सीमा बताने को कहा है। अब अगली सुनवाई 13 जुलाई को होगी।

जौनपुर। ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रदेश सरकार द्वारा मौजूदा प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद उत्तर प्रदेश के लाखों पंचायत प्रतिनिधियों और ग्राम प्रधानों की धड़कनें तेज हो गई हैं। अदालत ने इस व्यवस्था को प्रथम दृष्टया असंवैधानिक बताते हुए सरकार से पंचायत चुनाव कराने की स्पष्ट समय-सीमा बताने को कहा है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद प्रदेश की पंचायत राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। पंचायत प्रतिनिधियों के बीच अब यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि सरकार का फैसला न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाया, तो पंचायतों में चल रहे विकास कार्यों, प्रशासनिक निर्णयों और नई योजनाओं की स्वीकृति पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

13 जुलाई की सुनवाई पर टिकी सबकी नजर

मामले में अब अगली सुनवाई 13 जुलाई को निर्धारित की गई है। पंचायत प्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक दलों की निगाहें इसी तारीख पर टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि अदालत के अगले रुख से पंचायत चुनाव की दिशा और समय-सीमा दोनों स्पष्ट हो सकती हैं।

राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि अदालत सरकार के फैसले को खारिज करती है तो पंचायत चुनाव जल्द कराने का दबाव बढ़ सकता है।

क्या पर्याप्त कानूनी सलाह के बाद लिया गया था फैसला?

हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद यह सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या सरकार ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का निर्णय पर्याप्त संवैधानिक और कानूनी विचार-विमर्श के बाद लिया था। पंचायत राज व्यवस्था में निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका और संवैधानिक प्रावधानों को देखते हुए इस मुद्दे ने नई बहस को जन्म दे दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायतों के लोकतांत्रिक ढांचे को बनाए रखने के लिए समय पर चुनाव कराना संविधान की मूल भावना के अनुरूप है।

प्रधानों और पंचायत प्रतिनिधियों के बीच बंटी राय

हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद क्षेत्र के प्रधानों और पंचायत प्रतिनिधियों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

गैरवाह गांव के प्रधान विजय सिंह का कहना है कि सरकार का निर्णय पूरी तरह उचित था। उनके अनुसार प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशासक बनाए जाने पर उनकी जवाबदेही जनता के प्रति नहीं रहती, जबकि निर्वाचित प्रधान स्थानीय समस्याओं और जरूरतों को बेहतर ढंग से समझते हैं। उनका मानना है कि जब तक सरकार चुनावी तैयारियां पूरी नहीं कर लेती, तब तक चुनाव कराने का कोई औचित्य नहीं है।

वहीं सुइथाकलां प्रधान संघ के अध्यक्ष राम प्रकाश दुबे ने कहा कि सरकार और न्यायालय के बीच बने गतिरोध का खामियाजा प्रधानों और आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधान चुनाव के लिए पहले भी तैयार थे और आज भी तैयार हैं।

ईशापुर के प्रधान बलराम बिंद का मानना है कि पिछड़ा वर्ग आरक्षण सहित कई व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण सरकार को यह निर्णय लेना पड़ा था। हालांकि उन्होंने कहा कि अब न्यायालय के निर्णय पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।

सारी जहांगीर पट्टी के प्रधान राम सकल वर्मा ने कहा कि पिछड़ा वर्ग आरक्षण तय नहीं होने के कारण सरकार के सामने मजबूरी की स्थिति थी और जनता के हित में यह कदम उठाया गया था। अब सबकी निगाहें अदालत और सरकार के अगले कदम पर हैं।

समसुद्दीनपुर के प्रधान राजन यादव ने भी सरकार के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि विकास कार्यों की निरंतरता बनाए रखने के लिए प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया था, ताकि योजनाओं की गति प्रभावित न हो।

पंचायत चुनाव को लेकर बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी

प्रदेश में पंचायत चुनाव पहले ही पिछड़ा वर्ग आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों के कारण चर्चा में रहे हैं। ऐसे में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ने पंचायत चुनाव की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक सरगर्मी को और बढ़ा दिया है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अदालत के समक्ष क्या पक्ष रखती है और 13 जुलाई की सुनवाई के बाद पंचायत चुनाव की तस्वीर किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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