BCCI पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल, ‘नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट के दायरे में क्यों न लाया जाए?’
BCCI को नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट, 2025 के दायरे में लाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है। कोर्ट ने पदाधिकारियों की सेवा शर्तों और राज्य क्रिकेट संघों की स्थिति पर भी जवाब मांगा।
नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) और राज्य क्रिकेट संघों के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों को नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट, 2025 के दायरे में क्यों नहीं लाया जाना चाहिए। बीसीसीआई से जुड़ी कुछ अर्जियों पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह सवाल किया।
पीठ ने बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों की ओर से पेश वकीलों से इस मुद्दे पर संबंधित पक्षों से निर्देश लेने को कहा है। अदालत के सवाल के बाद अब बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों का पक्ष महत्वपूर्ण हो गया है।
पदाधिकारियों की सेवा शर्तों पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों के पदाधिकारियों की सेवा शर्तों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट करने को कहा। पीठ ने सवाल किया कि यदि नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट, 2025 लागू है, तो क्रिकेट संस्थाओं के पदाधिकारियों की सेवा शर्तें इसके प्रावधानों के अनुरूप क्यों नहीं होनी चाहिए।
इस मामले में बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों को अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखना होगा।
CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की सुनवाई
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों के मौजूदा प्रशासनिक ढांचे तथा नए खेल कानून के बीच संबंध को लेकर सवाल उठाए।
2014 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है BCCI का मामला
बीसीसीआई के प्रशासन और उसके कामकाज से संबंधित मामला वर्ष 2014 से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इस दौरान अदालत ने क्रिकेट प्रशासन में सुधार और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। लोढ़ा समिति को बीसीसीआई के कामकाज और प्रशासनिक ढांचे में सुधार के उपाय सुझाने की जिम्मेदारी दी गई थी।
लोढ़ा समिति की सिफारिशों से बदले थे BCCI के नियम
लोढ़ा समिति की सिफारिशों के बाद बीसीसीआई के प्रशासनिक ढांचे में कई बदलाव किए गए। समिति की सिफारिशों में बीसीसीआई के लिए नए संविधान और पदाधिकारियों के कार्यकाल को लेकर नियम शामिल थे।
सितंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई के संविधान में संशोधन की अनुमति दी थी। अदालत के इस फैसले के बाद पदाधिकारियों के कार्यकाल और कूलिंग-ऑफ अवधि से जुड़े प्रावधानों में बदलाव का रास्ता साफ हुआ।
12 साल तक पद पर रहने का प्रावधान
2022 के फैसले के बाद बीसीसीआई के पदाधिकारी राज्य क्रिकेट संघ और बीसीसीआई में कुल 12 वर्ष तक पद पर रह सकते हैं। इसमें राज्य क्रिकेट संघ में अधिकतम छह वर्ष और बीसीसीआई में छह वर्ष का कार्यकाल शामिल है।
इसके बाद तीन वर्ष की अनिवार्य कूलिंग-ऑफ अवधि का प्रावधान है। यानी निर्धारित लगातार कार्यकाल पूरा करने के बाद संबंधित पदाधिकारी को तीन साल तक पद से बाहर रहना होता है।
राज्य संघ और BCCI में कार्यकाल के नियम
सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में बीसीसीआई के संविधान से जुड़े नियमों में बदलाव को मंजूरी देते हुए राज्य क्रिकेट संघ और बीसीसीआई में पदाधिकारियों के लगातार कार्यकाल से जुड़े प्रावधानों को भी स्पष्ट किया था।
इन बदलावों के तहत किसी पदाधिकारी के राज्य संघ और फिर बीसीसीआई में कार्यकाल को लेकर पहले की कूलिंग-ऑफ व्यवस्था में बदलाव किया गया था।
नए खेल कानून के दायरे को लेकर बढ़ी अहमियत
सुप्रीम कोर्ट का ताजा सवाल क्रिकेट प्रशासन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बीसीसीआई लंबे समय से अपने प्रशासनिक ढांचे और स्वायत्तता को लेकर चर्चा के केंद्र में रहा है। ऐसे में नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट, 2025 के तहत उसकी स्थिति पर अदालत की टिप्पणी आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण हो सकती है।
अब बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों की ओर से अदालत में क्या जवाब दिया जाता है, इस पर नजर रहेगी। इस जवाब के आधार पर यह स्पष्ट हो सकता है कि नए खेल कानून के प्रावधानों को क्रिकेट प्रशासन पर किस तरह लागू किए जाने को लेकर संबंधित पक्षों का क्या रुख है।




