सपा का बड़ा दांव: बसपा के कद्दावर नेता रहे नसीमुद्दीन अब साइकिल पर सवार
“लखनऊ में अखिलेश यादव ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को सपा की सदस्यता दिलाई। बसपा और कांग्रेस छोड़ चुके नसीमुद्दीन की एंट्री को 2027 चुनाव से पहले मुस्लिम वोट बैंक साधने और ओवैसी की एमआईएम की धार कुंद करने की रणनीति माना जा रहा है।”
लखनऊ । राजधानी लखनऊ में रविवार को प्रदेश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया। पूर्व बसपा नेता और कांग्रेस से हाल ही में इस्तीफा देने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। सपा प्रमुख अखिलेश यादव उन्हें साथ लेकर पार्टी कार्यालय पहुंचे और औपचारिक रूप से सदस्यता दिलाई।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने 24 जनवरी को कांग्रेस से इस्तीफा दिया था। इसके बाद उनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर कयास लगाए जा रहे थे। चर्चा थी कि वे चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी से जुड़ सकते हैं या अपनी अलग रणनीति अपना सकते हैं। हालांकि अंततः उन्होंने सपा का दामन थाम लिया।
बसपा से सपा तक का सफर
नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पहचान बसपा सरकार में कद्दावर मंत्री के रूप में रही है। वे मायावती शासनकाल में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं और प्रदेश की मुस्लिम राजनीति में प्रभावशाली चेहरा माने जाते हैं। सपा में उनके आने को एक बड़े राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
सपा की रणनीति क्या?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सपा संगठन को मजबूत करने और मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है। हाल के वर्षों में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए सपा यह संदेश देना चाहती है कि मुस्लिम नेतृत्व का प्रमुख केंद्र वही है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड क्षेत्र में नसीमुद्दीन की पकड़ को देखते हुए पार्टी को संगठनात्मक मजबूती मिलने की उम्मीद है।
सियासी असर
आजम खान के जेल में रहने के बाद सपा में बड़े मुस्लिम चेहरे की कमी महसूस की जा रही थी। ऐसे में नसीमुद्दीन की एंट्री को उस खालीपन की भरपाई के रूप में भी देखा जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह कदम आने वाले चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है और प्रदेश की सियासत में नए गठजोड़ों और रणनीतियों का रास्ता खोल सकता है।




