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कुर्मी बनाम लोध: महोबा विवाद से लखनऊ तक गरमाई यूपी राजनीति, भाजपा नई उलझन में

“यूपी की सियासत में कुर्मी-लोध फैक्टर ने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। महोबा विवाद और लखनऊ में हुई लोध महासभा की बैठक से जातीय समीकरण बिगड़ते नजर आ रहे हैं। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।”

हाइलाइट्स :

  • कुर्मी-लोध फैक्टर से उत्तर प्रदेश की राजनीति में बढ़ी हलचल
  • महोबा विवाद ने लिया जातीय संघर्ष का रूप
  • लखनऊ में लोध महासभा की बैठक से भाजपा असहज
  • प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर लोध नेताओं में असंतोष
  • ओबीसी वोट बैंक पर असर को लेकर पार्टी सतर्क

लखनऊ। 30 जनवरी को महोबा दौरे के दौरान जलजीवन मिशन में कथित भ्रष्टाचार को लेकर लोध विधायक बृजभूषण राजपूत ने कुर्मी नेता और कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह के खिलाफ प्रदर्शन किया था। सौ से अधिक ग्राम प्रधानों के साथ हुए इस विरोध ने पार्टी के भीतर असहज स्थिति पैदा कर दी।

लखनऊ की बैठक ने बढ़ाई राजनीतिक बेचैनी

रविवार को लखनऊ के विश्वेश्वरैया हॉल में आयोजित अखिल भारतीय लोधा-लोधी और लोध महासभा की बैठक ने इस विवाद को और हवा दे दी। इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा, प्रदेश सरकार के मंत्री धर्मपाल सिंह सहित कई दिग्गज नेताओं की मौजूदगी को बृजभूषण राजपूत के समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है।

क्यों बढ़ा लोध नेताओं का असंतोष

भाजपा ने हाल ही में कुर्मी समाज से आने वाले पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। माना जा रहा है कि इसी फैसले के बाद लोध समाज के नेताओं में असंतोष बढ़ा, क्योंकि पार्टी के भीतर यह चर्चा थी कि बीएल वर्मा या धर्मपाल सिंह में से किसी को यह जिम्मेदारी मिल सकती है।

भाजपा का परंपरागत वोट बैंक खतरे में?

लोध समाज को भाजपा का परंपरागत समर्थक माना जाता है, जो पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के दौर से पार्टी से जुड़ा रहा है। वर्तमान में लोध समाज से बीएल वर्मा, धर्मपाल सिंह, संदीप सिंह, साक्षी महाराज, मुकेश राजपूत और अजेंद्र राजपूत जैसे चेहरे सक्रिय हैं।

वहीं कुर्मी समाज से स्वतंत्र देव सिंह, राकेश सचान, आशीष पटेल, संजय गंगवार और केंद्र में पंकज चौधरी व अनुप्रिया पटेल को अहम भूमिकाएं मिली हैं। ऐसे में दोनों जातियों के बीच शक्ति संतुलन को लेकर खींचतान खुलकर सामने आ गई है।

जातीय सम्मेलनों से गरमाई राजनीति

पिछले एक साल में प्रदेश में जातीय सम्मेलनों की बढ़ती संख्या ने राजनीति को और गरमा दिया है। क्षत्रिय, कुर्मी, लोध और ब्राह्मण विधायकों की अलग-अलग बैठकों ने भाजपा नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है।
प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने जाति विशेष की बैठकों पर रोक लगाने के निर्देश दिए थे, लेकिन इसके बावजूद लोध महासभा की बड़ी बैठक ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भाजपा नेतृत्व इस कुर्मी-लोध फैक्टर को कैसे संतुलित करता है, क्योंकि आने वाले चुनावों में यह समीकरण पार्टी के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।

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