बंगाल चुनाव से पहले ‘ग्रीन वॉर’, ममता बनर्जी पर सबूत मिटाने का आरोप
“ममता बनर्जी की ‘ग्रीन फाइल’ को लेकर बंगाल में सियासी तूफान मच गया है। आई-पैक पर ईडी छापे, मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे मामले ने केंद्र-राज्य टकराव को तेज कर दिया है।”
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक ही शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में है— ‘ग्रीन फाइल’। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ में दिखी इस फाइल ने न सिर्फ राज्य की राजनीति में उबाल ला दिया है, बल्कि केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक टकराव को भी चरम पर पहुंचा दिया है।
2026 विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने शेष हैं और ऐसे समय में तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति से जुड़ी संस्था आई-पैक पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। छापे के दौरान खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मौके पर पहुंचना, लैपटॉप और ‘ग्रीन फाइल’ के साथ बाहर निकलना अभूतपूर्व घटना मानी जा रही है।
ईडी का आरोप है कि कोयला तस्करी से जुड़े करीब 20 करोड़ रुपये हवाला के जरिए आई-पैक तक पहुंचे, जिनका इस्तेमाल 2022 के गोवा चुनाव में किया गया। वहीं ममता बनर्जी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे चुनावी रणनीति चुराने और राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है।
मुख्यमंत्री का कहना है कि भाजपा, केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर तृणमूल कांग्रेस की चुनावी तैयारी को नुकसान पहुंचाना चाहती है। इसी के विरोध में ममता ने कोलकाता की सड़कों पर पैदल मार्च किया, जबकि दिल्ली में तृणमूल सांसदों ने गृह मंत्रालय के सामने प्रदर्शन किया।
दूसरी ओर भाजपा ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने जांच में बाधा डाली और सबूत नष्ट किए। भाजपा सांसद संबित पात्रा ने कहा कि “ममता बनर्जी ने बंगाल को कानून से ऊपर रख दिया है।”
मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। ईडी ने अनुच्छेद 32 के तहत शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल की है, जबकि बंगाल सरकार ने कैविएट दाखिल कर अपना पक्ष सुने जाने की मांग की है। इसके अलावा राज्य पुलिस ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ ‘डाटा चोरी’ की एफआईआर भी दर्ज की है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा विवाद 2026 के चुनाव का रुख तय कर सकता है। यदि ममता इसे बंगाल की अस्मिता पर हमला साबित करने में सफल रहीं, तो उन्हें राजनीतिक लाभ मिल सकता है। वहीं अगर विपक्ष ‘ग्रीन फाइल’ में भ्रष्टाचार साबित कर देता है, तो तृणमूल के लिए राह मुश्किल हो सकती है।
फिलहाल, सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट और जांच एजेंसियों से निकलने वाले तथ्यों पर टिकी हैं, जो तय करेंगे कि बंगाल की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा।



