रेलवे बोर्ड अनुकंपा नौकरी दूसरी पत्नी संतान को भी मिलेगी, ऐतिहासिक फैसला लागू
“रेलवे बोर्ड अनुकंपा नौकरी दूसरी पत्नी संतान को लेकर बड़ा फैसला। 11 दिसंबर 2018 के बाद किए गए आवेदन अब पुरानी तारीख के आधार पर खारिज नहीं होंगे। जानिए नया नियम।”
नई दिल्ली। रेलवे बोर्ड अनुकंपा नौकरी दूसरी पत्नी संतान को लेकर भारतीय रेलवे ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी असर वाला फैसला लिया है। इस निर्णय के तहत अब किसी भी मृत रेल कर्मचारी की दूसरी पत्नी से उत्पन्न संतान को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने से इनकार नहीं किया जा सकेगा। रेल मंत्रालय द्वारा जारी नए स्पष्टीकरण ने दशकों से चली आ रही कानूनी और तकनीकी बाधाओं को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
रेलवे बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि यदि अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन 11 दिसंबर 2018 के बाद किया गया है, तो उसे केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि कर्मचारी की मृत्यु उससे पहले हुई थी। अब ऐसे सभी मामलों में निर्णय मेरिट और मानवीय दृष्टिकोण के आधार पर लिया जाएगा।
नियमों की जटिलता से मिली राहत
अब तक रेलवे में दूसरी पत्नी की संतान को लेकर अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में भ्रम और सख्ती बनी रहती थी। कई बार आवेदन केवल इसलिए निरस्त कर दिए जाते थे क्योंकि दूसरी शादी के लिए विभागीय अनुमति नहीं ली गई थी। इसका खामियाजा उन बच्चों को भुगतना पड़ता था, जिन्हें वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते थे।
2018 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का संदर्भ
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट (वी.आर. त्रिपाठी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया) ने साफ कहा था कि दूसरी पत्नी की संतान भी नौकरी की हकदार है। बावजूद इसके, रेलवे के कई जोन इस आदेश की संकीर्ण व्याख्या कर रहे थे। अब रेलवे बोर्ड के नए सर्कुलर RBE No. 08/2026 (21 जनवरी 2026) ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है।
देरी होगी माफ, मेरिट पर होगा चयन
रेलवे बोर्ड ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि यदि आवेदन में देरी भी हुई है, तो वे अपने अधिकारों का उपयोग कर उस देरी को माफ करें और पीड़ित परिवार को लाभ पहुंचाने का प्रयास करें। अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल नौकरी देना नहीं, बल्कि परिवार को आर्थिक संकट से उबारना है।
मुकदमों से मिलेगी राहत
इस फैसले से देशभर में चल रहे हजारों कानूनी मामलों में कमी आएगी। अब पीड़ित परिवारों को कोर्ट-कचहरी के बजाय सीधे रोजगार का अवसर मिल सकेगा, जिससे समय और सरकारी धन दोनों की बचत होगी।
सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम
रेलवे जैसे देश के सबसे बड़े नियोक्ता द्वारा लिया गया यह फैसला समाज को स्पष्ट संदेश देता है कि हर संतान समान अधिकार रखती है, चाहे वह पहली पत्नी की हो या दूसरी की।



