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इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: जज से संपर्क की कोशिश ‘कोर्ट के इतिहास का काला दिन’, न्यायमूर्ति सुनवाई से हटे

इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने कोडीन युक्त कफ सिरप मामले में जमानत याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। जज से संपर्क की कोशिश पर कोर्ट ने इसे ‘इतिहास का काला दिन’ बताते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर टिप्पणी की।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने न्यायिक स्वतंत्रता से जुड़े एक गंभीर घटनाक्रम पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जमानत मामले में पक्षकारों द्वारा न्यायाधीश से संपर्क करने की कोशिश न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सीधा प्रहार है। न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने इसे “न्यायपालिका के इतिहास का काला दिन” बताते हुए कोडीन युक्त कफ सिरप मामले से जुड़ी करीब 80 जमानत याचिकाओं की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया।

न्यायालय ने सभी याचिकाएं नई पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश को भेजने का निर्देश दिया है। अब इन मामलों की सुनवाई 7 अगस्त 2026 को होगी।

‘न्याय केवल होना नहीं, दिखना भी चाहिए’

गुरुवार को भोला प्रसाद जायसवाल समेत अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई शुरू होते ही न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने कहा कि सुनवाई पूरी होने के बाद आदेश सुरक्षित रखा जा सकता था, लेकिन उसके बाद कुछ पक्षकारों ने पीठासीन न्यायाधीश तक पहुंच बनाने और संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया। अदालत ने कहा कि यदि ऐसे आचरण को नजरअंदाज किया गया तो न्यायपालिका में जनता का विश्वास कमजोर होगा।

फैसले पर संदेह की आशंका

अपने आदेश में न्यायमूर्ति पहल ने कहा कि यदि फैसला उस पक्ष के पक्ष में आता, जिसका मामला सुनवाई के दौरान मजबूत प्रतीत हो रहा था, तो यह संदेह पैदा हो सकता था कि निर्णय न्यायिक विवेक के बजाय किसी बाहरी प्रभाव का परिणाम है। इसलिए न्यायिक निष्पक्षता बनाए रखने के लिए उन्होंने स्वयं को सुनवाई से अलग करना उचित समझा।

न्यायिक स्वतंत्रता पर सख्त टिप्पणी

हाई कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता किसी न्यायाधीश का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबित मामलों में न्यायाधीशों से निजी संपर्क स्थापित करने की कोशिश न्यायिक मर्यादा और कानून के शासन के विपरीत है तथा इसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए।

पहले भी नहीं मिली थी राहत

कोडीन युक्त कफ सिरप मामले में आरोपियों की प्राथमिकी रद्द करने की याचिकाएं पहले ही इलाहाबाद हाई कोर्ट की विभिन्न पीठों और लखनऊ खंडपीठ द्वारा खारिज की जा चुकी हैं। इसके बाद दायर अग्रिम जमानत याचिकाओं में भी राहत नहीं मिली थी। नियमित जमानत की कई याचिकाएं भी पहले अलग-अलग पीठों द्वारा खारिज की जा चुकी हैं। अब शेष मामलों की सुनवाई नई पीठ के समक्ष होगी।

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